विश्वास
आज समय उस स्तर तक की यात्रा कर चुका है जब विश्वास की पराकाष्ठा के निर्वाचन का निर्धारण कठिन ही नहीं असंभव सा हो गया है, व्यक्ति को सही पथ दर्शन भी स्वार्थ प्रतीत होता है यद्यपि अगले से मात खाना स्वीकार है परन्तु अपनों के मार्गदर्शन मे उन्हें सवार्थ परता का आभास होता है, जो किंचित मात्र भी नहीं होती परन्तु कौन समझाए की जिस दिखावे के पीछे वो छ्लांग लगाने हेतु प्रयासरत हैं कहीं ना कहीं वह छलावा मात्र है। खैर ठोकर लग कर ही ठाकुर बनते हैँ पर जो है सो है लिखा बदा तो होकर ही रहेगा। क्योंकि कुछ तो ठोकर लग कर भी नहीं संभल पा रहे उसी दिखावे की दुनिया मे तल्लीन हैँ।
।। *सर्वे भवन्तु सुखिनः* ।।
पं. योगेश संतोष भारद्वाज "योगी दीन"
शिक्षक एवं प्रेरक
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