मानवीय संवेदनाओं के मूल्य तब समझ आता है जब व्यक्ति स्वयं कठिन परिस्थिति में होता है और उस समय हम अपेक्षा करते हैं कि हमें प्रकृति सहयोग करे, हम यह भूल जाते हमारा अतीत क्या रहा ।
"परिणिति" मृत्यु सास्वत है, अब मृत्यु के उपरांत हम कहाँ जाएंगे हमारी गति क्या होगी यह इस बात पर निर्भर करता है कि जन्म से मृत्यु तक की यात्रा में हमने क्या किया, हमारे परिवार, साथियों, समाज के साथ हमारे संबंध कैसे रहे, सिर्फ सहयोग लिया या किसी के लिए कुछ किया भी, अपनी आवश्यकता पर तो सभी सहयोग की अपेक्षा करते हैं पर अन्य के लिये हमने क्या किया जबकि यदि हम करते और सहृदयता से काम करते तो अन्य की आवश्यकता को अपनी आवश्यकता समझ सहयोग कर सकते हैं अन्य के प्रति सहयोग की भावना से प्राप्त दुआ आशीष ही स्वर्ग एवं नरक के द्वार हैं। पं. योगेश संतोष भारद्वाज "योगी" शिक्षक एवं प्रेरक
भारत वर्ष को स्वतंत्र हुए अब तक 75 वर्ष पूर्ण होने को है हमने बहुत सारी उपलब्धियां प्राप्त की देश ने अनेकों कीर्तिमान स्थापित किये केंद्र और राज्य सरकारों ने अनेकों गरीबी उन्मूलन, सम नागरिकता, अश्पृश्यता उन्मूलन आदि योजनाएं लागू कीं उन पर काम भी किया परन्तु 75 वर्षो के बाद भी भारत का 35% आम नागरिक आज भी रोजी रोटी की तलाश में दर बदर भटकने पर विवश है ऐसा नहीं कि उसके अंदर जीविकोपार्जन की क्षमता नहीं है, क्षमता की बात करें तो बहुत पोटेंशिअल है हमारे देश के लोगों में परन्तु उन्मूलन की जो नीतियां हैं संभवतः वो कारगर नहीं हैं, ये नीतियां डायरेक्ट लाभ ना पहुंचाते हुए रोजगार के अवसर के मार्ग से क्रियान्वित की जाएं तो ज्यादा लाभदायक सिद्ध होंगी, आज की दिनचर्या के अनुसार सभी क्षेत्रों में आम जन अत्यंत महत्वाकांक्षी होते जा रहे हैं उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं कि हम जिस सुविधा से लाभान्वित हो रहे है उसका प्रयोग किसी रोजगार के प्रयोग में ले लें वरन वहः वह उसका प्रयोग केवल अपनी विलासिता को पूर्ण करने में करते है, शासन भी इस बात को जानती है कि हमारी योजना का दुरुपयोग होगा और हो रहा है परंतु वे उ...
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