परिणिति

"परिणिति"
मृत्यु सास्वत है, अब मृत्यु के उपरांत हम कहाँ जाएंगे हमारी गति क्या होगी यह इस बात पर निर्भर करता है कि जन्म से मृत्यु तक की यात्रा में हमने क्या किया, हमारे परिवार, साथियों, समाज के साथ हमारे संबंध कैसे रहे, सिर्फ सहयोग लिया या किसी के लिए कुछ किया भी, अपनी आवश्यकता पर तो सभी सहयोग की अपेक्षा करते हैं पर अन्य के लिये हमने क्या किया जबकि यदि हम करते और सहृदयता से काम करते तो अन्य की आवश्यकता को अपनी आवश्यकता समझ सहयोग कर सकते हैं अन्य के प्रति सहयोग की भावना से प्राप्त दुआ आशीष ही स्वर्ग एवं नरक के द्वार हैं।
पं. योगेश संतोष भारद्वाज "योगी"
       शिक्षक एवं प्रेरक

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