उद्यमी

किसी व्यक्ति का स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरों को हीन समझना, उस व्यक्ति का अहंकार का है जो उसे शीघ्र ही ले डूबता है। चाहे आप सफलता के किसी भी स्तर पर हों, जहाँ से आपका अहं का भाव प्रारम्भ होता है वहीं से पतन का मार्ग प्रारम्भ होता है, सफलता प्राप्त होने के उपरांत वहाँ पहुंचने जिन सीढ़ियों का प्रयोग किया है उन्हें भूलना या अनावश्यक समझकर नष्ट कर देना एक सफल उद्यमी की मूर्खता का पराकाष्ठा तक प्रमाण है 

पं. योगेश संतोष भारद्वाज "योगी"
         शिक्षक एवं प्रेरक

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