विखंडन
विखंडन प्रकृति का नियम है परंतु समय के साथ प्रकृति जब विखंडित करती है तो वह पुनर्मिलन की तैयारी करती है। मेरा मन कभी विखंडन की अनुमति नहीं देता, पर इस बात को मेरे अतिरिक्त कोई महसूस भी नहीं करता, ये सत्य है कि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी एक महत्वाकांक्षा होती है पर उस महत्वकांक्षा को पूरा करने के लिए हम अपनो से विखंडित हो जाएं ये तो सरासर गलत होगा, कभी कभी विचार आता है क्यों ना हम भी उन्हीं के जैसे हो जाएँ जैसे सभी है पर पुनः विचार आता है ईश्वर ने हमें इसके हेतु यहां नहीं भेजा, मुझे भेजा है संगठित करने संयोजित करने, अपनत्व का बीज बोने, चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े।
*वसुधैव कुटुम्ब* यही भाव सभी रखें तो विखंडन को स्थान मिलना असंभव है
"योगी"
पं. योगेश संतोष भारद्वाज
पं. योगेश संतोष भारद्वाज "योगी" शिक्षक एवं प्रेरक
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